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Do Main

दो मैं

मुझमे दो मैं बसते हैं |

एक मैं मस्त, बेबाक, ज़िन्दगी को एक मेले की तरह मिलता हूँ,

एक मैं संकोची, चुपचाप हर हार-नकार से डरता हूँ ||

एक मैं मुस्कुराता, खिलखिलाता, सबको गले लगता हूँ,

एक मैं अपने मन के अंधेरो में अनकही बातें दोहराता हूँ||

एक मैं मिलनसार, हर बात को किस्से-कहानियों में सुनाता हूँ,

एक मैं अपने अकेलेपन में ही खुदको सुरक्षित पाता हूँ||

एक मैं दोस्त जो बिना मांगे ही अपनी राय दिए जाता हूँ,

एक मैं स्वार्थी, अभिमानी जो अपने सिवा कुछ और न सोच पाता हूँ||

एक मैं आत्मविश्वासी-दृद्निश्चयी, सबसे अपनी बात मनवाता हूँ,

एक मैं अनिश्चित-अपरिचित सा अपने फैसलों से कतराता हूँ||

एक मैं ज्ञान-गुरु, सबको नित-नए पाठ पढाता हूँ,

एक मैं अंजान, अपने अंतरद्वंद से स्वयं ही घबराता हूँ||

एक मैं दिलवाला, जो सबसे दिल लगता हूँ,

एक मैं निर्मोही, जो अपनों से ही दुत्कार खाता हूँ||

एक मैं दबंग, जोशीला, हर काम में आगे आता हूँ,

एक मैं आलसी, निठल्ला, सुस्तराम कहलाता हूँ||

कही न कहीं, किसी न किसी अंष में मुझमें ये सब रहते हैं,

हर दिन मुझसे बेहतर इंसान बनने को कहते हैं,

ख्वाहिश है क़ि जल्द ही वो दिन आ जाये, जब दोनों मैं मुझमें एक हो जायें|

तब तक मैं इन दोनों मैं की गुत्थियाँ सुलाझाऊंगा,

और मुझमें दो मैं रहते हैं, यही कहता जाऊंगा||

Gudiya Bitiya…My first attempt to write a hindi kavita…

गुडियाबिटिया

नटखट अंखियो की कनखियों से मुस्कुराती वो,

यहाँ से वहा भागती खिलखिलाती वो,

अपनी नन्ही उंगलियों से मेरा हाथ थामे ‘मम्मा इद्हड़ आ’ कहके मुझे बुलाती वो,

कभी छुपती-छुपाती कभी बाहें बढाकर, मुझे गले लगती वो,

अपनी मीठी सी तोतली ज़बान में बोलकर, मेरा दिल पिघलाती वो,

जो पूछो की कौन हो तुम, तो खुदको मम्मा की गुडिया बिटिया बतलाती वो,

डांट फटकार लगाने से एक पल रूठकर, अगले ही पल सब भूल जाती वो,

न रुकती, न थकती , सारे घर को सर पर उठा, इठलाकर थोडा इतराकर चलती जाती वो,

चोट अगर खा ले कभी तो, गिरकर संभलके लहराते हुए, खुद ही झट खड़ी हो जाती वो,

य़ू तो माँ अपने बच्चे की पहली गुरु कहलाती है, मेरी बिटिया तो मुझे हर दिन एक नयी सीख दे जाती है|

न झूठ न फरेब, न बुराई न द्वेष, न बनावट न कलेश|

कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे, मुझे मेरी बिटिया सा बना दे|